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BRABU Environmental Science Unit-4 Biodiversity Notes | AEC-2 Semester 2 Complete Notes in Hindi and English


BRABU Environmental Science Unit 4 Biodiversity Part 1 Notes Thumbnail for AEC-2 Semester 2 Students


जैव विविधता के स्तर (Levels of Biological Diversity)

प्रिय विद्यार्थियों, जब हम अपने आसपास की प्रकृति को ध्यान से देखते हैं, तो एक बहुत रोचक बात सामने आती है। दुनिया में कोई भी दो जंगल, खेत, गांव या प्राकृतिक क्षेत्र बिल्कुल एक जैसे नहीं होते। यदि आप बिहार के किसी गांव के खेतों को देखें और उनकी तुलना असम के चाय बागानों से करें, तो दोनों में बहुत अंतर दिखाई देगा। इसी प्रकार राजस्थान के मरुस्थल और पश्चिमी घाट के घने वन एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न हैं।



यह अंतर केवल पेड़-पौधों की संख्या का नहीं होता, बल्कि वहां पाए जाने वाले जीवों, पौधों, सूक्ष्मजीवों, जलवायु, मिट्टी, जल स्रोतों और उनके पारस्परिक संबंधों का भी होता है। कहीं अधिक वर्षा होती है, कहीं कम; कहीं मिट्टी उपजाऊ होती है, तो कहीं रेतीली। इन सभी परिस्थितियों के कारण प्रत्येक क्षेत्र की जैविक संरचना अलग-अलग विकसित होती है।

यही कारण है कि प्रकृति में इतनी विविधता दिखाई देती है। इस विविधता को वैज्ञानिक भाषा में जैव विविधता (Biological Diversity or Biodiversity) कहा जाता है।

जैव विविधता का अर्थ पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी प्रकार के जीवों, उनके आनुवंशिक गुणों तथा उनके निवास स्थानों में मौजूद विविधता से है। यह केवल विभिन्न जीवों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके बीच पाए जाने वाले अंतर और उनके पर्यावरणीय संबंधों को भी सम्मिलित करती है।

वैज्ञानिकों ने जैव विविधता को समझने के लिए इसे मुख्यतः तीन स्तरों में विभाजित किया है।

  • आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity)
  • प्रजातीय विविधता (Species Diversity)
  • पारिस्थितिक तंत्र विविधता (Ecosystem Diversity)

1. आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity)

जब एक ही प्रजाति के विभिन्न व्यक्तियों में आनुवंशिक अंतर पाया जाता है, तो उसे आनुवंशिक विविधता कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, किसी जीव की प्रजाति के सदस्यों के जीनों में पाए जाने वाले भिन्नता के स्तर को आनुवंशिक विविधता कहते हैं।

आपने देखा होगा कि सभी मनुष्य एक जैसे नहीं दिखते। किसी की आंखों का रंग अलग होता है, किसी की ऊंचाई अलग होती है, किसी के बाल सीधे होते हैं तो किसी के घुंघराले। ये सभी अंतर जीनों के कारण उत्पन्न होते हैं। यही स्थिति पौधों और पशुओं में भी देखने को मिलती है।

यह कैसे उत्पन्न होती है?

आनुवंशिक विविधता मुख्य रूप से उत्परिवर्तन (Mutation), लैंगिक प्रजनन (Sexual Reproduction), जीन पुनर्संयोजन (Genetic Recombination) तथा प्राकृतिक चयन (Natural Selection) जैसी प्रक्रियाओं के कारण उत्पन्न होती है। समय के साथ पर्यावरणीय परिस्थितियां बदलती रहती हैं और जीव उन परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को अनुकूलित करते हैं। इस प्रक्रिया में जीनों में विविधता विकसित होती जाती है।

वास्तविक उदाहरण

उदाहरण आनुवंशिक विविधता
धान (Rice) भारत में धान की हजारों किस्में पाई जाती हैं जिनकी उत्पादन क्षमता, स्वाद और रोग प्रतिरोधक क्षमता अलग-अलग होती है।
आम (Mango) दशहरी, लंगड़ा, चौसा, अल्फांसो आदि विभिन्न किस्में आनुवंशिक विविधता का उदाहरण हैं।
मनुष्य त्वचा का रंग, ऊंचाई, चेहरे की बनावट तथा अन्य जैविक विशेषताएं।
गाय साहीवाल, गिर, थारपारकर जैसी नस्लों में स्पष्ट आनुवंशिक अंतर पाए जाते हैं।

इसका महत्व

आनुवंशिक विविधता किसी भी प्रजाति की दीर्घकालिक सुरक्षा का आधार होती है। यदि किसी क्षेत्र में रोग फैल जाए या जलवायु में परिवर्तन हो जाए, तो आनुवंशिक रूप से विविध जनसंख्या में कुछ जीव ऐसे होते हैं जो नई परिस्थितियों को सहन कर लेते हैं। इससे पूरी प्रजाति के विलुप्त होने का खतरा कम हो जाता है।

कृषि के क्षेत्र में भी इसका विशेष महत्व है। वैज्ञानिक अधिक उत्पादन देने वाली, रोग प्रतिरोधी तथा सूखा सहन करने वाली नई किस्मों का विकास आनुवंशिक विविधता की सहायता से करते हैं।

इसके कम होने पर प्रभाव

यदि किसी प्रजाति में आनुवंशिक विविधता कम हो जाए, तो वह रोगों, कीटों तथा पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है। ऐसी स्थिति में किसी एक बीमारी के फैलने से पूरी जनसंख्या नष्ट हो सकती है।

कृषि में एक ही किस्म की फसल को बड़े पैमाने पर उगाने से भी आनुवंशिक विविधता घटती है, जिससे भविष्य में खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है।


2. प्रजातीय विविधता (Species Diversity)

किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों की संख्या और उनकी सापेक्ष प्रचुरता को प्रजातीय विविधता कहा जाता है।

यदि किसी वन में केवल कुछ ही प्रकार के जीव पाए जाते हैं, तो उसकी प्रजातीय विविधता कम मानी जाएगी। इसके विपरीत यदि वहां सैकड़ों प्रकार के पौधे, पक्षी, स्तनधारी, कीट तथा सूक्ष्मजीव मौजूद हों, तो वह क्षेत्र अधिक प्रजातीय विविधता वाला माना जाएगा।

यह कैसे उत्पन्न होती है?

लाखों वर्षों तक चलने वाली विकासवादी प्रक्रियाओं (Evolutionary Processes) के कारण नई-नई प्रजातियों का निर्माण होता है। अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियां जीवों को अलग प्रकार से विकसित होने के लिए प्रेरित करती हैं। परिणामस्वरूप नई प्रजातियां अस्तित्व में आती हैं।

वास्तविक उदाहरण

भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जहां प्रजातीय विविधता अत्यंत समृद्ध है। पश्चिमी घाट, हिमालय, सुंदरबन और उत्तर-पूर्वी भारत इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

पश्चिमी घाट में हजारों प्रकार के पौधे, उभयचर, पक्षी और स्तनधारी पाए जाते हैं। इनमें से कई प्रजातियां ऐसी हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलतीं।

सुंदरबन क्षेत्र में रॉयल बंगाल टाइगर, मगरमच्छ, विभिन्न प्रकार की मछलियां, पक्षी और मैंग्रोव पौधों की अनेक प्रजातियां एक साथ पाई जाती हैं।

इसका महत्व

प्रजातीय विविधता किसी पारिस्थितिक तंत्र को स्थिर और संतुलित बनाए रखने में सहायता करती है। विभिन्न प्रजातियां भोजन श्रृंखला, परागण, पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण और जैविक नियंत्रण जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में भाग लेती हैं।

यदि किसी पारिस्थितिक तंत्र में अधिक प्रजातियां मौजूद हों, तो वह पर्यावरणीय परिवर्तनों का बेहतर सामना कर सकता है।

इसके कम होने पर प्रभाव

जब प्रजातियों की संख्या घटने लगती है, तो भोजन श्रृंखलाएं प्रभावित होती हैं। कुछ प्रजातियों के विलुप्त होने से अन्य जीवों के अस्तित्व पर भी संकट उत्पन्न हो सकता है।

उदाहरण के लिए यदि परागण करने वाले कीटों की संख्या कम हो जाए, तो अनेक पौधों का प्रजनन प्रभावित होगा। इससे कृषि उत्पादन तथा प्राकृतिक वनस्पतियों दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।


3. पारिस्थितिक तंत्र विविधता (Ecosystem Diversity)

पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिक तंत्रों की उपस्थिति को पारिस्थितिक तंत्र विविधता कहा जाता है। प्रत्येक पारिस्थितिक तंत्र में जीवों तथा उनके भौतिक पर्यावरण के बीच विशेष प्रकार के संबंध विकसित होते हैं।

वन, घासभूमि, मरुस्थल, आर्द्रभूमि, नदी, झील, पर्वतीय क्षेत्र तथा समुद्री क्षेत्र सभी अलग-अलग पारिस्थितिक तंत्र हैं।

यह कैसे उत्पन्न होती है?

जलवायु, तापमान, वर्षा, मिट्टी, स्थलाकृति और जल उपलब्धता में अंतर के कारण अलग-अलग प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र विकसित होते हैं। जहां अधिक वर्षा होती है वहां घने वन विकसित हो सकते हैं, जबकि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मरुस्थलीय पारिस्थितिक तंत्र विकसित होते हैं।

भारत के उदाहरण

क्षेत्र पारिस्थितिक तंत्र
पश्चिमी घाट उष्णकटिबंधीय वर्षावन
राजस्थान मरुस्थलीय पारिस्थितिक तंत्र
सुंदरबन मैंग्रोव पारिस्थितिक तंत्र
हिमालय पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र
कच्छ का रण लवणीय पारिस्थितिक तंत्र
चिल्का झील आर्द्रभूमि पारिस्थितिक तंत्र

इसका महत्व

विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र मानव जीवन के लिए अनेक सेवाएं प्रदान करते हैं। वन हमें ऑक्सीजन, लकड़ी और औषधीय पौधे देते हैं। नदियां और आर्द्रभूमियां जल उपलब्ध कराती हैं। मैंग्रोव तटीय क्षेत्रों को चक्रवातों से सुरक्षा प्रदान करते हैं।

प्रत्येक पारिस्थितिक तंत्र जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जितने अधिक प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र होंगे, उतनी ही अधिक जैव विविधता संरक्षित रह सकेगी।

इसके कम होने पर प्रभाव

वनों की कटाई, शहरीकरण, खनन तथा प्रदूषण के कारण अनेक पारिस्थितिक तंत्र नष्ट हो रहे हैं। जब कोई पारिस्थितिक तंत्र नष्ट होता है, तो उसके साथ वहां रहने वाली अनेक प्रजातियां भी संकट में पड़ जाती हैं।

उदाहरण के लिए मैंग्रोव वनों के नष्ट होने से तटीय जैव विविधता प्रभावित होती है और समुद्री तूफानों से होने वाली क्षति भी बढ़ जाती है।


तीनों स्तर एक-दूसरे से कैसे जुड़े हुए हैं?

जैव विविधता के ये तीनों स्तर अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

यदि किसी प्रजाति में पर्याप्त आनुवंशिक विविधता होगी, तो वह बदलती परिस्थितियों में जीवित रह सकेगी। इससे उस प्रजाति का अस्तित्व बना रहेगा और प्रजातीय विविधता सुरक्षित रहेगी।

जब किसी क्षेत्र में अनेक प्रजातियां मौजूद होंगी, तब वे मिलकर एक जटिल और संतुलित पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करेंगी। इस प्रकार प्रजातीय विविधता पारिस्थितिक तंत्र विविधता को मजबूत बनाती है।

दूसरी ओर विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र अनेक प्रजातियों को रहने के लिए अलग-अलग आवास उपलब्ध कराते हैं। इससे नई प्रजातियों का विकास होता है और आनुवंशिक विविधता भी बढ़ती है।

उदाहरण के लिए भारत का हिमालयी क्षेत्र अनेक ऊंचाई स्तरों, जलवायु परिस्थितियों और आवासों से मिलकर बना है। यहां विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र मौजूद हैं। इन पारिस्थितिक तंत्रों में हजारों प्रजातियां निवास करती हैं और प्रत्येक प्रजाति के भीतर आनुवंशिक विविधता भी पाई जाती है। इस प्रकार तीनों स्तर मिलकर जैव विविधता की समग्र संरचना का निर्माण करते हैं।

यदि इनमें से किसी एक स्तर को क्षति पहुंचती है, तो उसका प्रभाव अन्य दोनों स्तरों पर भी पड़ता है। इसलिए जैव विविधता संरक्षण का अर्थ केवल जीवों की रक्षा करना नहीं है, बल्कि उनके जीनों, प्रजातियों और पूरे पारिस्थितिक तंत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है।

आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity)

यदि सभी मनुष्य एक ही प्रजाति के हैं, तो फिर सभी एक जैसे क्यों नहीं दिखते?

यह एक बहुत महत्वपूर्ण और रोचक प्रश्न है। यदि हम दुनिया के किसी भी देश में चले जाएँ, तो हमें सभी मनुष्य एक ही प्रजाति अर्थात Homo sapiens के सदस्य मिलेंगे। फिर भी हर व्यक्ति का चेहरा, रंग, ऊँचाई, बालों का प्रकार, आँखों का रंग, शारीरिक बनावट और कई अन्य विशेषताएँ अलग-अलग होती हैं।

एक ही परिवार में जन्मे भाई-बहनों में भी पूर्ण समानता नहीं होती। जुड़वाँ बच्चों में भी समय के साथ कुछ अंतर दिखाई देने लगते हैं। यही स्थिति पौधों, पशुओं और सूक्ष्मजीवों में भी देखने को मिलती है।

प्रकृति में दिखाई देने वाले ये सभी अंतर अचानक उत्पन्न नहीं होते, बल्कि इनके पीछे जीवों की आनुवंशिक संरचना कार्य करती है। इसी आनुवंशिक आधार को समझने के लिए हमें सबसे पहले DNA, Gene, वंशागति और विविधता जैसी मूलभूत अवधारणाओं को समझना होगा।


DNA क्या होता है?

DNA का पूरा नाम Deoxyribonucleic Acid है। यह प्रत्येक जीवित कोशिका के भीतर पाया जाने वाला वह विशेष अणु है जिसमें जीव के निर्माण, वृद्धि, विकास और कार्यों से संबंधित समस्त जैविक जानकारी संग्रहित रहती है।

यदि किसी जीव को एक विशाल पुस्तक माना जाए, तो DNA उस पुस्तक की पूरी लिखित सामग्री के समान है। जीव के शरीर की प्रत्येक कोशिका में यह जानकारी सुरक्षित रहती है।

DNA मुख्य रूप से चार प्रकार के नाइट्रोजन क्षारों (Nitrogen Bases) से मिलकर बना होता है:

  • Adenine (A)
  • Thymine (T)
  • Guanine (G)
  • Cytosine (C)

इन चार आधारों का विशेष क्रम ही जीव की आनुवंशिक सूचना निर्धारित करता है। यही क्रम यह तय करता है कि जीव की आँखों का रंग क्या होगा, शरीर कितना विकसित होगा और वह किन विशेषताओं का प्रदर्शन करेगा।

सरल शब्दों में:
DNA जीव का जैविक ब्लूप्रिंट (Blueprint) या निर्माण नक्शा है।

Gene क्या होता है?

DNA का एक विशेष भाग जो किसी निश्चित गुण को नियंत्रित करता है, उसे जीन (Gene) कहा जाता है।

उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति की आँखों का रंग, बालों की प्रकृति या रक्त समूह जैसी विशेषताओं को नियंत्रित करने वाले अलग-अलग जीन होते हैं।

एक DNA अणु में हजारों जीन पाए जा सकते हैं और प्रत्येक जीन किसी न किसी जैविक कार्य या विशेषता से संबंधित होता है।

संरचना भूमिका
DNA सम्पूर्ण आनुवंशिक सूचना का संग्रह
Gene DNA का विशिष्ट भाग जो किसी गुण को नियंत्रित करता है

इस प्रकार कहा जा सकता है कि जीन DNA की कार्यात्मक इकाई (Functional Unit) है।


वंशागति (Heredity)

माता-पिता से संतानों में गुणों के स्थानांतरण की प्रक्रिया को वंशागति या Heredity कहा जाता है।

जब कोई बच्चा जन्म लेता है, तो उसे अपने माता-पिता दोनों से जीन प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि बच्चों में माता-पिता की कुछ विशेषताएँ दिखाई देती हैं।

उदाहरण के लिए:

  • चेहरे की बनावट
  • बालों का प्रकार
  • त्वचा का रंग
  • रक्त समूह
  • कुछ आनुवंशिक रोगों की प्रवृत्ति

वंशागति के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी जैविक विशेषताएँ स्थानांतरित होती रहती हैं।


विविधता (Variation)

यदि वंशागति केवल समानता उत्पन्न करती, तो दुनिया के सभी जीव एक जैसे दिखाई देते। लेकिन वास्तविकता में ऐसा नहीं है। प्रत्येक पीढ़ी में कुछ नए अंतर उत्पन्न होते हैं जिन्हें विविधता (Variation) कहा जाता है।

विविधता वह स्थिति है जिसमें एक ही प्रजाति के सदस्यों के बीच शारीरिक, जैविक या व्यवहारिक अंतर दिखाई देते हैं।

यही विविधता जीवों को बदलती हुई परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता प्रदान करती है।

ध्यान दें:
वंशागति समानता लाती है, जबकि विविधता भिन्नता उत्पन्न करती है। जीवन के विकास के लिए दोनों आवश्यक हैं।

आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) क्या है?

एक ही प्रजाति के विभिन्न व्यक्तियों के जीनों में पाए जाने वाले अंतर को आनुवंशिक विविधता कहा जाता है।

दूसरे शब्दों में, किसी प्रजाति की जनसंख्या में जितनी अधिक आनुवंशिक भिन्नता होगी, उसकी आनुवंशिक विविधता उतनी ही अधिक मानी जाएगी।

उदाहरण के लिए भारत में उगाई जाने वाली धान की हजारों किस्में एक ही प्रजाति से संबंधित हैं, फिर भी उनकी ऊँचाई, उत्पादन क्षमता, रोग प्रतिरोधकता तथा स्वाद में अंतर पाया जाता है। यही आनुवंशिक विविधता का परिणाम है।


आनुवंशिक विविधता कैसे उत्पन्न होती है?

1. Mutation (उत्परिवर्तन)

DNA के क्रम में अचानक होने वाले परिवर्तन को उत्परिवर्तन कहते हैं।

कभी-कभी DNA की संरचना में छोटे-छोटे परिवर्तन हो जाते हैं। ये परिवर्तन नई विशेषताओं को जन्म दे सकते हैं।

अधिकांश उत्परिवर्तन तटस्थ या हानिकारक हो सकते हैं, लेकिन कुछ उत्परिवर्तन जीव को विशेष लाभ प्रदान करते हैं।

उदाहरण के लिए किसी पौधे में ऐसा उत्परिवर्तन हो सकता है जिससे वह सूखे को अधिक सहन कर सके।

2. Recombination (पुनर्संयोजन)

लैंगिक प्रजनन के दौरान माता और पिता के जीन मिलकर नए संयोजन बनाते हैं। इस प्रक्रिया को पुनर्संयोजन कहते हैं।

इसी कारण प्रत्येक संतान अपने माता-पिता की बिल्कुल प्रतिलिपि नहीं होती।

मानव समाज में प्रत्येक व्यक्ति की आनुवंशिक पहचान अलग होने का मुख्य कारण पुनर्संयोजन ही है।

3. Natural Selection (प्राकृतिक चयन)

प्राकृतिक चयन वह प्रक्रिया है जिसमें पर्यावरण के अनुकूल गुण रखने वाले जीव अधिक समय तक जीवित रहते हैं और अधिक संतानों को जन्म देते हैं।

धीरे-धीरे लाभकारी जीन जनसंख्या में बढ़ जाते हैं जबकि अनुपयुक्त जीन कम होते जाते हैं।

इसी प्रक्रिया ने लाखों वर्षों में पृथ्वी पर अद्भुत जैव विविधता का निर्माण किया है।


भारतीय कृषि में आनुवंशिक विविधता

भारत जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध देश है। यहाँ कृषि और पशुपालन में आनुवंशिक विविधता के अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं।

धान की विभिन्न किस्में

भारत में धान की हजारों पारंपरिक और आधुनिक किस्में पाई जाती हैं।

धान की किस्म विशेषता
बासमती सुगंधित और उच्च गुणवत्ता वाला चावल
सवित्री उच्च उत्पादन क्षमता
सहभागी धान सूखा सहन करने की क्षमता
स्वर्णा कई क्षेत्रों में व्यापक खेती

इन किस्मों के बीच अंतर आनुवंशिक विविधता के कारण ही संभव है।

आम की विभिन्न किस्में

भारत को आम का जन्मस्थान माना जाता है। यहाँ आम की सैकड़ों किस्में पाई जाती हैं।

  • दशहरी
  • लंगड़ा
  • चौसा
  • अल्फांसो
  • मालदा
  • हिमसागर

इन सभी में स्वाद, आकार, रंग, सुगंध तथा उत्पादन क्षमता में स्पष्ट अंतर पाया जाता है।

देशी पशु नस्लें

भारत में पशुओं की अनेक देशी नस्लें मौजूद हैं।

नस्ल विशेषता
गिर अधिक दूध उत्पादन
साहीवाल उष्ण जलवायु में अनुकूलन
थारपारकर शुष्क क्षेत्रों में जीवित रहने की क्षमता
रेड सिंधी रोग प्रतिरोधक क्षमता

ये सभी नस्लें आनुवंशिक विविधता की अमूल्य धरोहर हैं।


आनुवंशिक विविधता किसी प्रजाति को विलुप्त होने से कैसे बचाती है?

कल्पना कीजिए कि किसी क्षेत्र में एक ही प्रकार के जीन वाले लाखों पौधे मौजूद हैं। यदि कोई नया रोग फैल जाए और वे सभी उस रोग के प्रति संवेदनशील हों, तो पूरी फसल नष्ट हो सकती है।

लेकिन यदि उस जनसंख्या में आनुवंशिक विविधता मौजूद है, तो कुछ पौधों में ऐसे जीन हो सकते हैं जो रोग का सामना कर सकें। वे जीवित रहेंगे, प्रजनन करेंगे और अगली पीढ़ी को भी वही लाभकारी गुण देंगे।

इसी प्रकार जलवायु परिवर्तन, सूखा, बाढ़, अत्यधिक तापमान या नए परजीवियों के प्रभाव से बचने में भी आनुवंशिक विविधता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

आनुवंशिक विविधता = प्रजाति का जैविक बीमा (Biological Insurance)

आनुवंशिक विविधता कम होने के दुष्परिणाम

जब किसी प्रजाति की आनुवंशिक विविधता घटने लगती है, तो उसके अस्तित्व पर गंभीर खतरे उत्पन्न होने लगते हैं।

  • रोगों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है।
  • पर्यावरणीय परिवर्तनों को सहन करने की क्षमता कम हो जाती है।
  • प्रजनन संबंधी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।
  • नई परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलन कठिन हो जाता है।
  • विलुप्त होने का खतरा बढ़ जाता है।

आधुनिक कृषि में केवल कुछ उच्च उत्पादक किस्मों पर अत्यधिक निर्भरता भी आनुवंशिक विविधता को कम कर रही है। यदि पारंपरिक किस्में समाप्त हो जाएँ, तो भविष्य में नई चुनौतियों का सामना करना कठिन हो सकता है।

इसी कारण वैज्ञानिक जर्मप्लाज्म बैंक, बीज बैंक और जैव विविधता संरक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से विभिन्न पौधों और पशुओं की आनुवंशिक संपदा को सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहे हैं।

प्रजातीय विविधता (Species Diversity)

कल्पना कीजिए कि आज की कक्षा किसी कमरे में नहीं, बल्कि एक विशाल और घने जंगल के बीच हो रही है। आप सभी विद्यार्थी मेरे साथ जंगल के एक पगडंडी मार्ग पर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड़ दिखाई दे रहे हैं। कहीं पक्षियों की मधुर आवाजें सुनाई दे रही हैं, तो कहीं झाड़ियों के बीच छोटे-छोटे कीट सक्रिय दिखाई दे रहे हैं।

यदि हम थोड़ी देर रुककर ध्यान से अवलोकन करें, तो हमें केवल पेड़ ही नहीं बल्कि अनेक प्रकार के जीव दिखाई देंगे। कुछ पेड़ों पर बंदर उछल-कूद कर रहे होंगे, कहीं हिरणों का झुंड चर रहा होगा, तो कहीं तितलियाँ फूलों पर मंडरा रही होंगी। जमीन की मिट्टी में असंख्य बैक्टीरिया और कवक भी सक्रिय होंगे, जिन्हें हम अपनी आँखों से नहीं देख सकते।

अब सोचिए, यदि इस जंगल में केवल एक ही प्रकार का पेड़ होता, केवल एक ही प्रकार का पक्षी होता और बाकी सभी जीव अनुपस्थित होते, तो क्या यह जंगल इतना जीवंत और संतुलित दिखाई देता? बिल्कुल नहीं।

जंगल की वास्तविक सुंदरता और उसकी पारिस्थितिक शक्ति इस बात में छिपी होती है कि वहाँ कितनी विभिन्न प्रजातियाँ (Species) मौजूद हैं। यही हमें प्रजातीय विविधता की अवधारणा तक ले जाती है।


प्रजाति (Species) क्या होती है?

प्रजातीय विविधता को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि प्रजाति किसे कहते हैं।

ऐसे जीवों का समूह जो आपस में प्रजनन कर सकते हैं और उर्वर संतानों को जन्म दे सकते हैं, एक प्रजाति कहलाता है।

उदाहरण के लिए सभी मनुष्य एक प्रजाति हैं, सभी बाघ एक प्रजाति हैं तथा सभी एशियाई हाथी एक अलग प्रजाति हैं।

प्रकृति में लाखों विभिन्न प्रजातियाँ मौजूद हैं और प्रत्येक प्रजाति की अपनी विशेष भूमिका होती है।


प्रजातीय विविधता (Species Diversity) क्या है?

किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों की संख्या तथा उनके वितरण की स्थिति को प्रजातीय विविधता कहा जाता है।

दूसरे शब्दों में, किसी जंगल, घासभूमि, झील या समुद्री क्षेत्र में कितनी अलग-अलग प्रजातियाँ मौजूद हैं और वे किस अनुपात में उपस्थित हैं, यही प्रजातीय विविधता का आधार है।

यदि किसी वन में सैकड़ों प्रकार के पौधे, पक्षी, स्तनधारी, कीट और सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं, तो वहाँ प्रजातीय विविधता अधिक मानी जाएगी। इसके विपरीत यदि किसी क्षेत्र में केवल कुछ ही प्रकार की प्रजातियाँ मौजूद हों, तो उसकी प्रजातीय विविधता कम होगी।

सरल शब्दों में:
किसी क्षेत्र में "कितनी प्रकार की प्रजातियाँ हैं" और "वे कितनी संतुलित संख्या में मौजूद हैं", यही प्रजातीय विविधता कहलाती है।

प्रजातीय विविधता के दो प्रमुख घटक

वैज्ञानिक केवल प्रजातियों की संख्या गिनकर ही प्रजातीय विविधता का निर्धारण नहीं करते। वे दो महत्वपूर्ण पहलुओं का अध्ययन करते हैं:

  • Species Richness (प्रजातीय समृद्धता)
  • Species Evenness (प्रजातीय समान वितरण)

1. Species Richness (प्रजातीय समृद्धता)

किसी क्षेत्र में उपस्थित कुल विभिन्न प्रजातियों की संख्या को Species Richness कहा जाता है।

मान लीजिए दो जंगल हैं। पहले जंगल में 20 प्रकार की प्रजातियाँ हैं और दूसरे जंगल में 200 प्रकार की प्रजातियाँ हैं। स्पष्ट रूप से दूसरे जंगल की Species Richness अधिक होगी।

क्षेत्र प्रजातियों की संख्या Species Richness
जंगल A 20 कम
जंगल B 200 अधिक

अधिक प्रजातीय समृद्धता वाला क्षेत्र सामान्यतः अधिक जटिल और अधिक स्थिर पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करता है।


2. Species Evenness (प्रजातीय समान वितरण)

केवल प्रजातियों की संख्या जानना पर्याप्त नहीं है। यह भी महत्वपूर्ण है कि विभिन्न प्रजातियाँ कितनी संतुलित संख्या में मौजूद हैं।

इसे Species Evenness कहा जाता है।

मान लीजिए किसी जंगल में 1000 जीव हैं। यदि उनमें 950 केवल एक ही प्रजाति के हैं और बाकी 50 जीव अन्य सभी प्रजातियों के हैं, तो वहाँ Evenness कम होगी।

लेकिन यदि 1000 जीव लगभग समान रूप से विभिन्न प्रजातियों में विभाजित हों, तो वहाँ Evenness अधिक होगी।

महत्वपूर्ण अंतर:
Species Richness बताती है कि कितनी प्रजातियाँ मौजूद हैं।
Species Evenness बताती है कि वे प्रजातियाँ कितनी संतुलित संख्या में उपस्थित हैं।




कुछ क्षेत्रों में प्रजातियों की संख्या अधिक और कुछ में कम क्यों होती है?

जब हम पृथ्वी के विभिन्न भागों का अध्ययन करते हैं, तो पाते हैं कि सभी क्षेत्रों में समान प्रजातीय विविधता नहीं होती। कुछ क्षेत्रों में असाधारण जैव विविधता पाई जाती है जबकि कुछ क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम।

इसके पीछे कई कारण कार्य करते हैं।

जलवायु (Climate)

जहाँ तापमान और वर्षा संतुलित होती है, वहाँ अधिक प्रकार के जीव जीवित रह सकते हैं। इसलिए उष्णकटिबंधीय वर्षावनों में प्रजातीय विविधता अत्यधिक होती है।

भोजन की उपलब्धता

जिस क्षेत्र में भोजन के अधिक स्रोत उपलब्ध होंगे, वहाँ अधिक जीव प्रजातियाँ निवास कर सकेंगी।

आवासों की विविधता

यदि किसी क्षेत्र में जंगल, नदी, झील, घासभूमि और पर्वत सभी मौजूद हों, तो वहाँ अनेक प्रकार के आवास बनते हैं और विविध प्रजातियाँ बस सकती हैं।

विकासवादी इतिहास

कुछ क्षेत्रों में लाखों वर्षों से स्थिर पर्यावरण मौजूद रहा है। ऐसे क्षेत्रों में नई प्रजातियों के विकास के लिए पर्याप्त समय मिला, जिसके कारण वहाँ जैव विविधता अधिक हो गई।


भारत के जंगलों में प्रजातीय विविधता

भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जहाँ अत्यधिक जैव विविधता पाई जाती है।

यदि हम पश्चिमी घाट या पूर्वोत्तर भारत के जंगलों में जाएँ, तो वहाँ हजारों पौधों की प्रजातियाँ, सैकड़ों पक्षी प्रजातियाँ, अनेक उभयचर, सरीसृप और स्तनधारी जीव मिलेंगे।

इन क्षेत्रों में कई ऐसी प्रजातियाँ भी पाई जाती हैं जो पृथ्वी पर कहीं और नहीं मिलतीं। इन्हें स्थानिक (Endemic) प्रजातियाँ कहा जाता है।

क्षेत्र विशेषता
पश्चिमी घाट उच्च स्थानिक प्रजातियाँ और घने वर्षावन
पूर्वोत्तर भारत पक्षियों, ऑर्किड और उभयचरों की समृद्ध विविधता
हिमालय ऊँचाई के अनुसार बदलती जैव विविधता

आर्द्रभूमियों (Wetlands) में प्रजातीय विविधता

आर्द्रभूमियाँ जैव विविधता के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। झीलों, दलदलों, नदियों के किनारों और मैंग्रोव क्षेत्रों में अनेक प्रकार के जीव पाए जाते हैं।

उदाहरण के लिए चिल्का झील में मछलियों, पक्षियों, क्रस्टेशियनों तथा जलीय पौधों की अनेक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

सर्दियों के मौसम में हजारों प्रवासी पक्षी भी यहाँ आते हैं, जिससे प्रजातीय विविधता और बढ़ जाती है।


घासभूमियों (Grasslands) में प्रजातीय विविधता

अक्सर लोग घासभूमियों को केवल घास का मैदान समझ लेते हैं, लेकिन वास्तव में ये अत्यंत समृद्ध पारिस्थितिक तंत्र होते हैं।

यहाँ अनेक प्रकार की घासें, कीट, साँप, पक्षी तथा शाकाहारी स्तनधारी जीव पाए जाते हैं।

भारत की घासभूमियाँ काला हिरण, चिंकारा, भारतीय भेड़िया और अनेक दुर्लभ पक्षियों का आवास हैं।


समुद्री क्षेत्रों में प्रजातीय विविधता

समुद्र पृथ्वी का सबसे बड़ा पारिस्थितिक तंत्र है। भारत के समुद्री क्षेत्रों में कोरल रीफ, समुद्री घास, मछलियाँ, डॉल्फिन, कछुए और असंख्य सूक्ष्म जीव पाए जाते हैं।

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप के कोरल रीफ समुद्री प्रजातीय विविधता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

एक छोटे से कोरल रीफ में हजारों प्रजातियाँ एक-दूसरे पर निर्भर रहकर जीवन व्यतीत करती हैं।


विभिन्न प्रजातियाँ मिलकर पारिस्थितिक संतुलन कैसे बनाए रखती हैं?

अब हम फिर उसी जंगल में लौटते हैं जहाँ से हमने अपनी यात्रा शुरू की थी।

कल्पना कीजिए कि जंगल के सभी कीट अचानक गायब हो जाएँ। तब अनेक पक्षियों को भोजन नहीं मिलेगा। यदि पक्षियों की संख्या घटेगी, तो बीजों का प्रसार कम होगा। यदि बीजों का प्रसार कम होगा, तो नए पौधों का विकास प्रभावित होगा।

इसी प्रकार यदि शाकाहारी जीव समाप्त हो जाएँ, तो मांसाहारी जीवों के लिए भोजन उपलब्ध नहीं रहेगा। यदि अपघटक जीव जैसे बैक्टीरिया और कवक समाप्त हो जाएँ, तो मृत जैविक पदार्थों का विघटन रुक जाएगा।

इससे स्पष्ट होता है कि प्रत्येक प्रजाति पारिस्थितिक तंत्र में एक विशेष भूमिका निभाती है।



प्रजाति समूह मुख्य भूमिका
पौधे भोजन और ऑक्सीजन का उत्पादन
परागणकर्ता कीट पौधों के प्रजनन में सहायता
शाकाहारी जीव ऊर्जा का स्थानांतरण
मांसाहारी जीव जनसंख्या नियंत्रण
अपघटक पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण

इस प्रकार प्रजातीय विविधता केवल विभिन्न जीवों की सूची नहीं है, बल्कि यह उन जटिल संबंधों का जाल है जो पूरे पारिस्थितिक तंत्र को स्थिर, उत्पादक और जीवंत बनाए रखता है। जितनी अधिक प्रजातीय विविधता होगी, उतना ही अधिक मजबूत और संतुलित पारिस्थितिक तंत्र विकसित होगा।

पारिस्थितिक तंत्र विविधता (Ecosystem Diversity)

प्रिय विद्यार्थियों, आज हम किसी पुस्तक के पन्नों में नहीं, बल्कि भारत की एक लंबी और रोमांचक पर्यावरणीय यात्रा पर निकल रहे हैं। कल्पना कीजिए कि हम सभी एक शैक्षणिक भ्रमण पर हैं और पूरे भारत के विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों का अवलोकन कर रहे हैं।

हमारी यात्रा उत्तर में स्थित बर्फ से ढके हिमालय से शुरू होगी, फिर हम घने जंगलों में जाएंगे, उसके बाद विशाल घासभूमियों को देखेंगे, फिर राजस्थान के रेगिस्तान की ओर बढ़ेंगे, वहाँ से नदियों के संसार में प्रवेश करेंगे और अंत में महासागरों की विशाल जलराशि तक पहुँचेंगे।

इस पूरी यात्रा के दौरान आप एक महत्वपूर्ण बात अनुभव करेंगे—भारत का प्रत्येक क्षेत्र एक-दूसरे से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। कहीं ऊँचे पर्वत हैं, कहीं घने वन हैं, कहीं केवल घास का विस्तार है, कहीं रेत के टीले हैं, कहीं मीठे जल की नदियाँ हैं और कहीं खारे जल का महासागर।

यही विविधता हमें पारिस्थितिक तंत्र विविधता (Ecosystem Diversity) की अवधारणा को समझने में सहायता करती है।


पारिस्थितिक तंत्र विविधता क्या है?

पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता को पारिस्थितिक तंत्र विविधता कहा जाता है।

दूसरे शब्दों में, किसी क्षेत्र में उपस्थित विभिन्न प्राकृतिक आवासों, उनके पर्यावरणीय घटकों तथा उनमें रहने वाले जीवों की विविधता ही पारिस्थितिक तंत्र विविधता कहलाती है।

वन, पर्वत, घासभूमि, रेगिस्तान, नदी, झील, आर्द्रभूमि और महासागर सभी अलग-अलग पारिस्थितिक तंत्र हैं।

सरल शब्दों में:
जब प्रकृति अलग-अलग प्रकार के आवास और जीवन प्रणालियाँ बनाती है, तो उसे पारिस्थितिक तंत्र विविधता कहा जाता है।



यात्रा का पहला पड़ाव: हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र

हमारी यात्रा भारत के उत्तर में स्थित हिमालय से प्रारंभ होती है। जैसे-जैसे हम ऊँचाई की ओर बढ़ते हैं, तापमान कम होने लगता है और वातावरण ठंडा होता जाता है।



जलवायु

हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक ठंड, बर्फबारी तथा कम तापमान पाया जाता है। ऊँचाई बढ़ने के साथ जलवायु और अधिक कठोर हो जाती है।

मिट्टी

यहाँ की मिट्टी सामान्यतः पतली, पथरीली तथा जैविक पदार्थों से सीमित होती है। कई स्थानों पर मिट्टी का निर्माण अभी भी जारी रहता है।

वनस्पति

निचले क्षेत्रों में देवदार, चीड़ और फर के वृक्ष पाए जाते हैं। ऊँचाई बढ़ने पर झाड़ियाँ तथा अल्पाइन घासभूमियाँ दिखाई देती हैं।

जीव-जंतु

हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग, हिमालयी भालू, याक तथा अनेक दुर्लभ पक्षी यहाँ पाए जाते हैं।

पारिस्थितिक विशेषताएँ

हिमालय एशिया की अनेक प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल है। यह जलवायु नियंत्रण तथा जल संरक्षण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

घटक विशेषता
जलवायु अत्यधिक ठंडी और हिमाच्छादित
मिट्टी पतली एवं पथरीली
वनस्पति चीड़, देवदार, फर
जीव हिम तेंदुआ, याक, कस्तूरी मृग

दूसरा पड़ाव: भारतीय वन पारिस्थितिक तंत्र

अब हम पर्वतों से नीचे उतरकर भारत के घने जंगलों में प्रवेश करते हैं। यहाँ का वातावरण हिमालय से बिल्कुल भिन्न है।

चारों ओर ऊँचे वृक्ष, पक्षियों की आवाजें, कीटों की गतिविधियाँ और असंख्य जीव-जंतु दिखाई देते हैं।

जलवायु

वनों की जलवायु क्षेत्र के अनुसार बदलती है। पश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्वी भारत में अत्यधिक वर्षा होती है जबकि मध्य भारत के वनों में मध्यम वर्षा होती है।

मिट्टी

वन क्षेत्रों की मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है क्योंकि पत्तियों और मृत जीवों का निरंतर अपघटन होता रहता है।

वनस्पति

साल, सागौन, बाँस, महोगनी तथा अनेक प्रकार के वृक्ष और झाड़ियाँ पाई जाती हैं।

जीव-जंतु

बाघ, हाथी, तेंदुआ, हिरण, बंदर, अनेक पक्षी और असंख्य कीट यहाँ निवास करते हैं।

पारिस्थितिक विशेषताएँ

वन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, ऑक्सीजन प्रदान करते हैं तथा जैव विविधता के सबसे बड़े भंडार माने जाते हैं।


तीसरा पड़ाव: घासभूमि पारिस्थितिक तंत्र

अब हम ऐसे क्षेत्र में पहुँचते हैं जहाँ ऊँचे वृक्षों के स्थान पर दूर-दूर तक फैली हुई घास दिखाई देती है। यह घासभूमि पारिस्थितिक तंत्र है।

पहली नजर में यह क्षेत्र साधारण लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह अत्यंत समृद्ध जैव विविधता वाला पारिस्थितिक तंत्र है।

जलवायु

यहाँ सामान्यतः मध्यम वर्षा होती है, जो घासों के विकास के लिए उपयुक्त होती है लेकिन घने जंगलों के लिए पर्याप्त नहीं होती।

मिट्टी

घासभूमियों की मिट्टी अक्सर उपजाऊ होती है और कृषि के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

वनस्पति

विभिन्न प्रकार की घासें और छोटे पौधे प्रमुख रूप से पाए जाते हैं।

जीव-जंतु

काला हिरण, चिंकारा, भारतीय भेड़िया, लोमड़ी तथा अनेक घासभूमि पक्षी यहाँ पाए जाते हैं।

पारिस्थितिक विशेषताएँ

घासभूमियाँ बड़े शाकाहारी जीवों के लिए भोजन का प्रमुख स्रोत हैं तथा मिट्टी संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।


चौथा पड़ाव: रेगिस्तानी पारिस्थितिक तंत्र

अब हमारी यात्रा राजस्थान के थार मरुस्थल की ओर बढ़ती है। यहाँ का दृश्य पहले देखे गए सभी क्षेत्रों से बिल्कुल अलग है।

दूर-दूर तक रेत के टीले दिखाई देते हैं और वनस्पति बहुत कम दिखाई देती है।

जलवायु

अत्यधिक गर्म दिन और अपेक्षाकृत ठंडी रातें यहाँ की प्रमुख विशेषता हैं। वर्षा अत्यंत कम होती है।

मिट्टी

रेतीली मिट्टी पाई जाती है जो जल को लंबे समय तक नहीं रोक पाती।

वनस्पति

कैक्टस, बबूल, खेजड़ी तथा अन्य सूखा-सहनशील पौधे पाए जाते हैं।

जीव-जंतु

ऊँट, रेगिस्तानी लोमड़ी, चिंकारा तथा विभिन्न प्रकार के सरीसृप यहाँ पाए जाते हैं।

पारिस्थितिक विशेषताएँ

यहाँ के जीवों और पौधों में जल संरक्षण की विशेष अनुकूलन क्षमता विकसित होती है।


पाँचवाँ पड़ाव: नदी पारिस्थितिक तंत्र

अब हम भारत की नदियों की ओर बढ़ते हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, गोदावरी और कावेरी जैसी नदियाँ विशाल मीठे जल के पारिस्थितिक तंत्र बनाती हैं।

जलवायु

नदी की जलवायु उसके भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार बदलती है।

मिट्टी

नदी किनारे की मिट्टी अत्यंत उपजाऊ होती है क्योंकि बाढ़ के दौरान पोषक तत्व जमा होते रहते हैं।

वनस्पति

जलीय पौधे, घासें और नदी किनारे की वनस्पति प्रमुख होती हैं।

जीव-जंतु

मछलियाँ, कछुए, डॉल्फिन, मगरमच्छ तथा अनेक जलीय जीव पाए जाते हैं।

पारिस्थितिक विशेषताएँ

नदियाँ पोषक तत्वों के परिवहन, सिंचाई, पेयजल और जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।


अंतिम पड़ाव: महासागरीय पारिस्थितिक तंत्र

अब हमारी यात्रा भारत के तटीय क्षेत्रों और विशाल महासागरों तक पहुँचती है। यहाँ का संसार पूरी तरह जलमय है।

अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर मिलकर भारत को विशाल समुद्री जैव विविधता प्रदान करते हैं।

जलवायु

समुद्री क्षेत्रों में आर्द्रता अधिक होती है और तापमान अपेक्षाकृत स्थिर रहता है।

मिट्टी

समुद्र तल पर रेत, गाद तथा जैविक अवसाद पाए जाते हैं।

वनस्पति

समुद्री शैवाल, समुद्री घास तथा मैंग्रोव वनस्पतियाँ प्रमुख होती हैं।

जीव-जंतु

कोरल, मछलियाँ, डॉल्फिन, व्हेल, समुद्री कछुए तथा असंख्य सूक्ष्म जीव यहाँ पाए जाते हैं।

पारिस्थितिक विशेषताएँ

महासागर पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करते हैं, ऑक्सीजन उत्पादन में योगदान देते हैं तथा वैश्विक कार्बन चक्र का महत्वपूर्ण भाग हैं।


प्रत्येक पारिस्थितिक तंत्र अलग क्यों है?

अब जब हमारी यात्रा समाप्त होने वाली है, तो एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—हिमालय, जंगल, घासभूमि, रेगिस्तान, नदियाँ और महासागर एक-दूसरे से इतने अलग क्यों हैं?

इसका उत्तर पर्यावरणीय कारकों में छिपा है। प्रत्येक क्षेत्र में तापमान, वर्षा, मिट्टी, जल उपलब्धता, ऊँचाई और सूर्य प्रकाश की मात्रा अलग होती है। यही कारक तय करते हैं कि वहाँ कौन-सी वनस्पति विकसित होगी और कौन-से जीव जीवित रह पाएँगे।

जहाँ अधिक वर्षा होगी वहाँ घने वन विकसित होंगे। जहाँ पानी की कमी होगी वहाँ मरुस्थल बनेगा। जहाँ लगातार जल मौजूद रहेगा वहाँ नदी और आर्द्रभूमि पारिस्थितिक तंत्र विकसित होंगे।


अलग-अलग पारिस्थितिक तंत्र अलग-अलग प्रकार के जीवन को कैसे सहारा देते हैं?

प्रत्येक पारिस्थितिक तंत्र जीवन के लिए विशिष्ट परिस्थितियाँ प्रदान करता है। हिमालय हिम तेंदुए को आश्रय देता है, जंगल बाघों और हाथियों को, घासभूमियाँ काले हिरण को, रेगिस्तान ऊँट को, नदियाँ डॉल्फिन को और महासागर असंख्य समुद्री जीवों को।

यदि पृथ्वी पर केवल एक ही प्रकार का पारिस्थितिक तंत्र होता, तो इतनी विशाल जैव विविधता कभी विकसित नहीं हो पाती। विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों की उपस्थिति ही पृथ्वी को जीवन से भरपूर और संतुलित बनाती है।

इसीलिए पारिस्थितिक तंत्र विविधता केवल प्राकृतिक सौंदर्य का विषय नहीं है, बल्कि पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता का मूल आधार है।

भारत के जैव-भौगोलिक क्षेत्र (Biogeographic Zones of India)

हिमालय में हिम तेंदुआ मिलता है लेकिन राजस्थान के रेगिस्तान में क्यों नहीं?

पहली नज़र में यह प्रश्न बहुत सरल लगता है, लेकिन वास्तव में यह भारत की जैव विविधता को समझने की कुंजी है। यदि सभी जीव पृथ्वी पर कहीं भी रह सकते, तो हिम तेंदुआ राजस्थान के रेगिस्तान में भी दिखाई देता और ऊँट हिमालय की बर्फीली चोटियों पर घूमता हुआ मिलता।

लेकिन प्रकृति ऐसा नहीं करती। प्रत्येक जीव अपने आसपास के पर्यावरण के अनुसार विकसित होता है। जिस क्षेत्र की जलवायु, तापमान, भोजन, जल उपलब्धता और आवास उसकी आवश्यकताओं के अनुकूल होते हैं, वही उसका प्राकृतिक घर बन जाता है।

यही कारण है कि भारत के विभिन्न भागों में अलग-अलग प्रकार के पौधे और जीव पाए जाते हैं। कहीं बर्फीले पर्वत हैं, कहीं वर्षावन, कहीं रेगिस्तान, कहीं समुद्री द्वीप और कहीं विशाल घासभूमियाँ।

इन्हीं प्राकृतिक भिन्नताओं के आधार पर वैज्ञानिकों ने भारत को विभिन्न जैव-भौगोलिक क्षेत्रों (Biogeographic Zones) में विभाजित किया है।


जैव-भौगोलिक क्षेत्र क्या होते हैं?

जैव-भौगोलिक क्षेत्र ऐसे बड़े प्राकृतिक क्षेत्र होते हैं जहाँ की जलवायु, भू-आकृति, मिट्टी, वनस्पति और जीव-जंतु एक-दूसरे से मिलते-जुलते होते हैं।

दूसरे शब्दों में, किसी क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियाँ और वहाँ विकसित होने वाला जीवन मिलकर एक विशिष्ट प्राकृतिक पहचान बनाते हैं। इसी पहचान के आधार पर उस क्षेत्र को एक जैव-भौगोलिक क्षेत्र माना जाता है।

सरल शब्दों में:
जिन क्षेत्रों में प्रकृति और वहाँ का जीवन एक जैसी विशेषताएँ प्रदर्शित करते हैं, उन्हें जैव-भौगोलिक क्षेत्र कहा जाता है।

वैज्ञानिक भारत को विभिन्न जैव-भौगोलिक क्षेत्रों में क्यों बाँटते हैं?

भारत विश्व के सबसे विविध देशों में से एक है। यहाँ हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर उष्णकटिबंधीय वर्षावन, विशाल रेगिस्तान, घासभूमियाँ, नदियाँ और महासागर तक सब कुछ मौजूद है।

यदि पूरे भारत को एक ही प्राकृतिक क्षेत्र मान लिया जाए, तो यहाँ की जैव विविधता को समझना अत्यंत कठिन हो जाएगा।

इसलिए वैज्ञानिक भारत को अलग-अलग जैव-भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित करते हैं ताकि:

  • जैव विविधता का अध्ययन आसान हो सके।
  • वन्यजीव संरक्षण योजनाएँ बनाई जा सकें।
  • दुर्लभ और स्थानिक प्रजातियों की पहचान की जा सके।
  • प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर प्रबंधन किया जा सके।
  • पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रभावों का अध्ययन किया जा सके।

भारत के प्रमुख जैव-भौगोलिक क्षेत्र




अब आइए एक रोमांचक यात्रा पर निकलते हैं और भारत के विभिन्न जैव-भौगोलिक क्षेत्रों को एक-एक करके समझते हैं।


1. हिमालयी क्षेत्र (Himalayan Zone)

हमारी यात्रा भारत के उत्तर में स्थित हिमालय से शुरू होती है। यहाँ ऊँचे-ऊँचे पर्वत, बर्फ से ढकी चोटियाँ और ठंडी हवाएँ हमारा स्वागत करती हैं।

भौगोलिक स्थिति

जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र।

जलवायु

अत्यधिक ठंडी, ऊँचाई के अनुसार बदलती हुई तथा कई क्षेत्रों में वर्ष भर हिमाच्छादित।

वनस्पति

देवदार, चीड़, फर, स्प्रूस तथा अल्पाइन घासभूमियाँ।

प्रमुख वन्यजीव

हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग, लाल पांडा, हिमालयी भालू और याक।

पारिस्थितिक महत्व

भारत की प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल तथा जलवायु संतुलन का महत्वपूर्ण केंद्र।


2. ट्रांस-हिमालय क्षेत्र (Trans-Himalayan Zone)

अब हम हिमालय के पार लद्दाख और स्पीति जैसे क्षेत्रों में पहुँचते हैं। यह क्षेत्र भारत का ठंडा मरुस्थल कहलाता है।

भौगोलिक स्थिति

लद्दाख, काराकोरम तथा स्पीति क्षेत्र।

जलवायु

अत्यंत शुष्क और अत्यधिक ठंडी।

वनस्पति

छोटी झाड़ियाँ, विरल घासें तथा ठंड-सहनशील पौधे।

प्रमुख वन्यजीव

तिब्बती जंगली गधा, हिम तेंदुआ, नीली भेड़।

पारिस्थितिक महत्व

उच्च पर्वतीय जैव विविधता और दुर्लभ वन्यजीवों का आश्रय स्थल।


3. मरुस्थलीय क्षेत्र (Desert Zone)

अब हम पश्चिम भारत के थार मरुस्थल में पहुँचते हैं जहाँ दूर-दूर तक रेत के विशाल टीले दिखाई देते हैं।

भौगोलिक स्थिति

राजस्थान और गुजरात के कुछ भाग।

जलवायु

गर्म और शुष्क, अत्यंत कम वर्षा।

वनस्पति

कैक्टस, बबूल, खेजड़ी और अन्य सूखा-सहनशील पौधे।

प्रमुख वन्यजीव

ऊँट, चिंकारा, रेगिस्तानी लोमड़ी और ग्रेट इंडियन बस्टर्ड।

पारिस्थितिक महत्व

शुष्क क्षेत्रों में जीवन के अनुकूलन का उत्कृष्ट उदाहरण।


4. अर्ध-शुष्क क्षेत्र (Semi-Arid Zone)

मरुस्थल से बाहर निकलते ही हम ऐसे क्षेत्रों में पहुँचते हैं जहाँ थोड़ी अधिक वर्षा होती है और वनस्पति भी कुछ अधिक दिखाई देती है।

भौगोलिक स्थिति

पंजाब, हरियाणा, गुजरात तथा राजस्थान के कुछ भाग।

जलवायु

कम वर्षा लेकिन मरुस्थल से अधिक आर्द्रता।

वनस्पति

झाड़ियाँ, घासें और विरल वृक्ष।

प्रमुख वन्यजीव

नीलगाय, काला हिरण, लोमड़ी।

पारिस्थितिक महत्व

घासभूमि और कृषि क्षेत्रों के बीच संक्रमण क्षेत्र।


5. पश्चिमी घाट (Western Ghats)

अब हम दक्षिण भारत के पश्चिमी घाटों में पहुँचते हैं, जिन्हें विश्व के सबसे महत्वपूर्ण जैव विविधता हॉटस्पॉट में गिना जाता है।

भौगोलिक स्थिति

महाराष्ट्र से लेकर केरल तक फैली पर्वत श्रृंखला।

जलवायु

अधिक वर्षा और आर्द्र वातावरण।

वनस्पति

घने सदाबहार वन और वर्षावन।

प्रमुख वन्यजीव

नीलगिरि तहर, शेरपूंछ बंदर, मालाबार गिलहरी।

पारिस्थितिक महत्व

उच्च स्थानिक प्रजातियों का केंद्र और जल संसाधनों का प्रमुख स्रोत।


6. दक्कन प्रायद्वीप (Deccan Peninsula)

भारत का सबसे बड़ा जैव-भौगोलिक क्षेत्र दक्कन का पठारी भाग है।

भौगोलिक स्थिति

मध्य और दक्षिण भारत का विशाल पठारी क्षेत्र।

जलवायु

उष्णकटिबंधीय एवं मानसूनी।

वनस्पति

साल, सागौन, बाँस और शुष्क पतझड़ी वन।

प्रमुख वन्यजीव

बाघ, तेंदुआ, गौर, जंगली कुत्ता।

पारिस्थितिक महत्व

भारत के अधिकांश राष्ट्रीय उद्यान और बाघ अभयारण्य इसी क्षेत्र में स्थित हैं।


7. गंगा का मैदान (Gangetic Plain)

अब हम उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों में पहुँचते हैं।

भौगोलिक स्थिति

पंजाब से पश्चिम बंगाल तक फैला विशाल मैदान।

जलवायु

उष्णकटिबंधीय मानसूनी।

वनस्पति

घासभूमियाँ, कृषि फसलें और नदी तटीय वनस्पति।

प्रमुख वन्यजीव

गंगा डॉल्फिन, घड़ियाल, सारस।

पारिस्थितिक महत्व

भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी प्रणाली और कृषि क्षेत्र।


8. उत्तर-पूर्व भारत (North-East India)

अब हम ऐसे क्षेत्र में पहुँचते हैं जहाँ प्रकृति ने जैव विविधता का खजाना बिखेर दिया है।

भौगोलिक स्थिति

असम, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश।

जलवायु

अत्यधिक वर्षा और आर्द्र वातावरण।

वनस्पति

घने उष्णकटिबंधीय वर्षावन।

प्रमुख वन्यजीव

एक सींग वाला गैंडा, हूलॉक गिब्बन, क्लाउडेड लेपर्ड।

पारिस्थितिक महत्व

भारत की सबसे समृद्ध जैव विविधता और अनेक स्थानिक प्रजातियों का घर।


9. तटीय क्षेत्र (Coastal Zone)

अब हम भारत की लंबी समुद्री तटरेखा पर पहुँचते हैं।

भौगोलिक स्थिति

अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के तटीय भाग।

जलवायु

आर्द्र और समुद्री प्रभाव वाली।

वनस्पति

मैंग्रोव वन और समुद्री घास।

प्रमुख वन्यजीव

खारे पानी का मगरमच्छ, समुद्री कछुए, डॉल्फिन।

पारिस्थितिक महत्व

तूफानों से सुरक्षा तथा समुद्री जैव विविधता का संरक्षण।


10. द्वीपीय क्षेत्र (Island Zone)

हमारी यात्रा का अंतिम पड़ाव अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप द्वीप समूह हैं।

भौगोलिक स्थिति

बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में स्थित द्वीप।

जलवायु

उष्णकटिबंधीय और समुद्री।

वनस्पति

सदाबहार वन, मैंग्रोव और नारियल वनस्पति।

प्रमुख वन्यजीव

निकोबार कबूतर, समुद्री कछुए, कोरल रीफ जीव।

पारिस्थितिक महत्व

उच्च स्थानिकता तथा समुद्री जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण।


एक नज़र में भारत के जैव-भौगोलिक क्षेत्र

क्षेत्र प्रमुख विशेषता
हिमालय बर्फीले पर्वत और हिम तेंदुआ
ट्रांस-हिमालय ठंडा मरुस्थल
मरुस्थल ऊँट और शुष्क पर्यावरण
अर्ध-शुष्क घासभूमियाँ और झाड़ियाँ
पश्चिमी घाट जैव विविधता हॉटस्पॉट
दक्कन प्रायद्वीप बाघ और पतझड़ी वन
गंगा मैदान उपजाऊ मैदान और नदी तंत्र
उत्तर-पूर्व भारत अत्यधिक जैव विविधता
तटीय क्षेत्र मैंग्रोव और समुद्री जीवन
द्वीपीय क्षेत्र कोरल रीफ और स्थानिक प्रजातियाँ

अब यदि कोई पूछे कि हिम तेंदुआ हिमालय में मिलता है लेकिन राजस्थान में क्यों नहीं, तो उत्तर स्पष्ट है। प्रत्येक जीव उस जैव-भौगोलिक क्षेत्र में रहता है जहाँ की जलवायु, भोजन, वनस्पति और पर्यावरणीय परिस्थितियाँ उसके जीवन के लिए उपयुक्त होती हैं। यही कारण है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार की जैव विविधता विकसित हुई है और यही भारत को विश्व के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले देशों में शामिल करती है।

भारत एक मेगा जैव-विविधता राष्ट्र (India as a Mega Biodiversity Nation)

"दुनिया के कुल भू-भाग का केवल लगभग 2.4% हिस्सा भारत के पास है, लेकिन विश्व की लगभग 8% ज्ञात जैव विविधता भारत में पाई जाती है।"

यह तथ्य सुनकर आश्चर्य होना स्वाभाविक है। आखिर एक ऐसा देश, जिसका क्षेत्रफल विश्व के कुल भू-भाग की तुलना में अपेक्षाकृत छोटा है, वह इतनी विशाल जैव विविधता का घर कैसे बन गया?

अब एक क्षण के लिए सोचिए—

"आखिर ऐसा क्या है जो भारत को दुनिया के सबसे समृद्ध जैव-विविधता वाले देशों में शामिल करता है?"

इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें भारत की पर्वत श्रृंखलाओं, घने वनों, विशाल मैदानों, रेगिस्तानों, नदियों, समुद्री तटों और द्वीपों की यात्रा करनी होगी। जैसे-जैसे हम भारत के विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों से गुजरेंगे, हमें समझ में आएगा कि प्रकृति ने इस देश को जैविक संपदा का अनमोल खजाना क्यों बनाया है।


मेगा जैव-विविधता राष्ट्र (Mega Biodiversity Nation) क्या होता है?

ऐसे देश जहाँ विश्व की जैव विविधता का अत्यधिक बड़ा हिस्सा पाया जाता है और जहाँ बड़ी संख्या में स्थानिक प्रजातियाँ (Endemic Species) मौजूद होती हैं, उन्हें मेगा जैव-विविधता राष्ट्र कहा जाता है।

स्थानिक प्रजातियाँ वे होती हैं जो दुनिया में केवल किसी विशेष क्षेत्र में ही पाई जाती हैं और अन्य स्थानों पर प्राकृतिक रूप से नहीं मिलतीं।

सरल शब्दों में:
जिन देशों में असाधारण जैव विविधता और बड़ी संख्या में दुर्लभ एवं विशिष्ट जीव-जंतु तथा पौधे पाए जाते हैं, वे मेगा जैव-विविधता राष्ट्र कहलाते हैं।

दुनिया के मेगा जैव-विविधता देशों का परिचय

विश्व में कुछ ही देशों को मेगा जैव-विविधता राष्ट्र का दर्जा प्राप्त है। ये देश पृथ्वी की अधिकांश जैव विविधता को अपने भीतर समेटे हुए हैं।

देश विशेषता
ब्राज़ील अमेज़न वर्षावन का विशाल भाग
भारत विविध जलवायु और पारिस्थितिक तंत्र
इंडोनेशिया द्वीपीय जैव विविधता
ऑस्ट्रेलिया उच्च स्थानिक प्रजातियाँ
मेक्सिको रेगिस्तान से वर्षावन तक विविधता
चीन विशाल भौगोलिक विविधता
दक्षिण अफ्रीका समृद्ध वनस्पति विविधता

भारत इन चुनिंदा देशों में शामिल है, जो इसकी जैविक समृद्धि को दर्शाता है।


भारत को मेगा जैव-विविधता राष्ट्र का दर्जा क्यों मिला?

भारत को यह दर्जा किसी एक कारण से नहीं मिला। इसके पीछे अनेक प्राकृतिक विशेषताएँ हैं जो मिलकर इस देश को जैव विविधता का केंद्र बनाती हैं।

  • अत्यधिक भौगोलिक विविधता
  • विभिन्न प्रकार की जलवायु
  • विविध स्थलाकृतियाँ
  • अनेक पारिस्थितिक तंत्र
  • हजारों स्थानिक प्रजातियाँ
  • दो वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट
  • समृद्ध समुद्री एवं तटीय जैव विविधता

अब हम इन कारणों को विस्तार से समझते हैं।




1. भौगोलिक विविधता (Geographical Diversity)

कल्पना कीजिए कि आप भारत के नक्शे पर उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम की यात्रा कर रहे हैं।

उत्तर में हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाएँ हैं। पश्चिम में विशाल थार मरुस्थल है। दक्षिण में लंबी समुद्री तटरेखा है। पूर्वोत्तर में घने वर्षावन हैं और बीच में विशाल पठार एवं मैदान फैले हुए हैं।

इतनी भौगोलिक विविधता विश्व के बहुत कम देशों में देखने को मिलती है।

हर भौगोलिक क्षेत्र अलग प्रकार के जीवों और पौधों के लिए उपयुक्त आवास प्रदान करता है।


2. जलवायु विविधता (Climatic Diversity)

भारत की जलवायु एक जैसी नहीं है।

लद्दाख में तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है, जबकि राजस्थान में गर्मियों के दौरान तापमान 50°C तक पहुँच सकता है।

मेघालय के कुछ क्षेत्रों में विश्व की सर्वाधिक वर्षा होती है, जबकि थार मरुस्थल में वर्षा अत्यंत कम होती है।

यह विविध जलवायु विभिन्न प्रकार के जीवों और वनस्पतियों को विकसित होने का अवसर प्रदान करती है।

याद रखें:
जहाँ जलवायु बदलती है, वहाँ जैव विविधता भी बदलती है।

3. स्थलाकृतिक विविधता (Topographical Diversity)

स्थलाकृति का अर्थ है किसी क्षेत्र का भौतिक स्वरूप।

भारत में ऊँचे पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ, रेगिस्तान, नदी तट, मैंग्रोव वन और द्वीप सभी पाए जाते हैं।

इन सभी क्षेत्रों की भौतिक परिस्थितियाँ अलग हैं, इसलिए प्रत्येक क्षेत्र में जीवन का स्वरूप भी अलग विकसित हुआ है।

यही कारण है कि हिमालय में हिम तेंदुआ मिलता है जबकि सुंदरवन में रॉयल बंगाल टाइगर।


4. पारिस्थितिक विविधता (Ecological Diversity)

भारत में अनेक प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र पाए जाते हैं।

  • पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र
  • वन पारिस्थितिक तंत्र
  • घासभूमि पारिस्थितिक तंत्र
  • रेगिस्तानी पारिस्थितिक तंत्र
  • नदी एवं आर्द्रभूमि पारिस्थितिक तंत्र
  • समुद्री पारिस्थितिक तंत्र
  • मैंग्रोव पारिस्थितिक तंत्र

प्रत्येक पारिस्थितिक तंत्र अपनी विशिष्ट जैव विविधता को सहारा देता है।


अब आइए भारत की जैविक संपदा की खोज करें




अब हम भारत के उन क्षेत्रों की यात्रा करेंगे जो इसकी जैव विविधता को विश्व स्तर पर विशेष बनाते हैं।


हिमालय: बर्फ और जीवन का अद्भुत संसार

हमारी यात्रा हिमालय से शुरू होती है। ऊँचे पर्वत, हिमनद और बर्फ से ढकी चोटियाँ यहाँ का दृश्य प्रस्तुत करती हैं।

यहाँ हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग, लाल पांडा और हिमालयी मोनाल जैसे दुर्लभ जीव पाए जाते हैं।

ऊँचाई बढ़ने के साथ वनस्पति और जीव-जंतु बदलते जाते हैं, जिससे जैव विविधता की कई परतें विकसित होती हैं।


पश्चिमी घाट: जैव विविधता का खजाना

अब हम दक्षिण भारत के पश्चिमी घाट में पहुँचते हैं।

यह क्षेत्र विश्व के प्रमुख Biodiversity Hotspots में शामिल है।

यहाँ नीलगिरि तहर, शेरपूंछ बंदर, मालाबार गिलहरी और हजारों स्थानिक पौधों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

घने सदाबहार वन इस क्षेत्र को जैव विविधता का स्वर्ग बनाते हैं।


उत्तर-पूर्व भारत: प्रकृति का जीवित संग्रहालय

पूर्वोत्तर भारत पहुँचते ही ऐसा महसूस होता है मानो हम किसी विशाल प्राकृतिक संग्रहालय में आ गए हों।

अत्यधिक वर्षा, घने वर्षावन और जटिल पर्वतीय भू-भाग इस क्षेत्र को असाधारण जैव विविधता प्रदान करते हैं।

एक सींग वाला गैंडा, हूलॉक गिब्बन, क्लाउडेड लेपर्ड और अनेक दुर्लभ ऑर्किड यहाँ पाए जाते हैं।


सुंदरवन: ज्वार-भाटे और बाघों की भूमि

अब हम गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा में स्थित सुंदरवन पहुँचते हैं।

यह विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन है।

यहाँ के पेड़ खारे पानी में जीवित रह सकते हैं, जो अपने आप में एक अद्भुत अनुकूलन है।

सुंदरवन रॉयल बंगाल टाइगर, मगरमच्छ, कछुए और अनेक पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास है।


थार मरुस्थल: कठोर परिस्थितियों में जीवन

अब हमारी यात्रा राजस्थान के थार मरुस्थल में पहुँचती है।

पहली नजर में यह क्षेत्र जीवन के लिए अनुपयुक्त प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में यहाँ भी अद्भुत जैव विविधता मौजूद है।

ऊँट, चिंकारा, रेगिस्तानी लोमड़ी और ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसे जीव इस कठोर वातावरण में सफलतापूर्वक जीवन जीते हैं।

यह क्षेत्र हमें सिखाता है कि जीवन परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल सकता है।


भारत की जैव विविधता एक नज़र में

विशेषता योगदान
भौगोलिक विविधता अनेक प्रकार के आवास
जलवायु विविधता विभिन्न प्रजातियों के लिए उपयुक्त वातावरण
स्थलाकृतिक विविधता अलग-अलग जीवन क्षेत्रों का निर्माण
पारिस्थितिक विविधता अनेक पारिस्थितिक तंत्रों की उपस्थिति
स्थानिक प्रजातियाँ विशिष्ट जैविक पहचान
जैव विविधता हॉटस्पॉट वैश्विक संरक्षण महत्व

निष्कर्ष: प्रकृति का खजाना

जब हम हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर पश्चिमी घाट के वर्षावनों, उत्तर-पूर्व के हरे-भरे जंगलों, सुंदरवन के मैंग्रोव वनों और थार के रेगिस्तान तक की यात्रा करते हैं, तब हमें समझ में आता है कि भारत केवल एक देश नहीं बल्कि असंख्य पारिस्थितिक संसारों का संगम है।

यही अद्भुत विविधता भारत को विश्व के चुनिंदा मेगा जैव-विविधता राष्ट्रों में स्थान दिलाती है। यह जैविक संपदा केवल भारत की नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता की अमूल्य धरोहर है, जिसकी रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है।

भारत की संकटग्रस्त प्रजातियाँ (Endangered Species of India)

कल्पना कीजिए कि आने वाले 50 वर्षों में बाघ, लाल पांडा या गिद्ध केवल किताबों में ही दिखाई दें।

आप किसी राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा पर जाएँ और वहाँ बाघ देखने के बजाय केवल उसकी तस्वीर लगी हो। किसी चिड़ियाघर में बच्चों को यह बताया जाए कि लाल पांडा कभी हिमालय के जंगलों में पाया जाता था, लेकिन अब वह पृथ्वी से हमेशा के लिए गायब हो चुका है। गंगा नदी बह रही हो, लेकिन उसमें डॉल्फिन की छलांगें अब केवल पुरानी कहानियों का हिस्सा बन गई हों।

यह केवल एक काल्पनिक स्थिति नहीं है। यदि हम जैव विविधता संरक्षण के प्रति गंभीर नहीं हुए, तो अनेक प्रजातियाँ वास्तव में विलुप्ति के कगार पर पहुँच सकती हैं।

इसीलिए वैज्ञानिक, वन्यजीव शोधकर्ता और पर्यावरणविद् उन प्रजातियों पर विशेष ध्यान देते हैं जिनकी संख्या लगातार कम हो रही है। ऐसी प्रजातियों को संकटग्रस्त प्रजातियाँ (Endangered Species) कहा जाता है।


संकटग्रस्त प्रजाति (Endangered Species) क्या होती है?

ऐसी जीव या वनस्पति प्रजातियाँ जिनकी जनसंख्या इतनी तेजी से घट रही हो कि निकट भविष्य में उनके विलुप्त होने का खतरा उत्पन्न हो जाए, उन्हें संकटग्रस्त प्रजातियाँ कहा जाता है।

इन प्रजातियों की संख्या प्राकृतिक कारणों, आवास विनाश, शिकार, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन तथा मानव गतिविधियों के कारण लगातार कम होती जाती है।

सरल शब्दों में:
जब किसी प्रजाति के पृथ्वी से हमेशा के लिए गायब होने का वास्तविक खतरा उत्पन्न हो जाता है, तब उसे संकटग्रस्त प्रजाति कहा जाता है।

IUCN Red List क्या है?

IUCN का पूरा नाम International Union for Conservation of Nature है।

यह विश्व की सबसे महत्वपूर्ण संरक्षण संस्था है, जो विभिन्न जीवों और पौधों की संरक्षण स्थिति का मूल्यांकन करती है।

IUCN द्वारा प्रकाशित सूची को IUCN Red List कहा जाता है।

इस सूची में प्रजातियों को उनकी जनसंख्या और विलुप्ति के खतरे के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में रखा जाता है।

श्रेणी अर्थ
Least Concern (LC) कम चिंता वाली प्रजातियाँ
Near Threatened (NT) भविष्य में खतरे की संभावना
Vulnerable (VU) संवेदनशील प्रजातियाँ
Endangered (EN) संकटग्रस्त प्रजातियाँ
Critically Endangered (CR) अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियाँ
Extinct in the Wild (EW) प्राकृतिक आवास में विलुप्त
Extinct (EX) पूर्णतः विलुप्त



किसी प्रजाति को संकटग्रस्त कैसे घोषित किया जाता है?

किसी प्रजाति को केवल अनुमान के आधार पर संकटग्रस्त घोषित नहीं किया जाता। वैज्ञानिक वर्षों तक उसके बारे में अध्ययन करते हैं।

निम्नलिखित कारकों का विश्लेषण किया जाता है:

  • कुल जनसंख्या का आकार
  • जनसंख्या में गिरावट की दर
  • प्राकृतिक आवास का आकार
  • प्रजनन क्षमता
  • भविष्य में विलुप्ति की संभावना
  • मानवीय गतिविधियों का प्रभाव

यदि किसी प्रजाति की संख्या लगातार कम होती जा रही हो और उसके अस्तित्व पर गंभीर खतरा हो, तो उसे IUCN द्वारा Endangered या Critically Endangered श्रेणी में रखा जा सकता है।


भारत की प्रमुख संकटग्रस्त प्रजातियाँ

अब आइए भारत की उन महत्वपूर्ण प्रजातियों की यात्रा पर चलें जिनका संरक्षण आज अत्यंत आवश्यक है।


1. बंगाल टाइगर (Bengal Tiger)

बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है और भारतीय वनों की शक्ति तथा गौरव का प्रतीक माना जाता है।

निवास स्थान

सुंदरवन, मध्य भारत के वन, पश्चिमी घाट, हिमालय की तलहटी तथा कई राष्ट्रीय उद्यान।

प्रमुख विशेषताएँ

  • शक्तिशाली शिकारी
  • नारंगी रंग की त्वचा पर काली धारियाँ
  • खाद्य श्रृंखला का शीर्ष शिकारी

जनसंख्या में गिरावट के कारण

  • अवैध शिकार
  • वनों की कटाई
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष
  • आवास का विखंडन

संरक्षण प्रयास

प्रोजेक्ट टाइगर, राष्ट्रीय उद्यान, बाघ अभयारण्य और कड़े वन्यजीव संरक्षण कानून।


2. एशियाई शेर (Asiatic Lion)

एक समय एशियाई शेर पश्चिम एशिया से लेकर भारत तक फैले हुए थे, लेकिन आज इनका प्राकृतिक आवास बहुत सीमित रह गया है।

निवास स्थान

गुजरात का गिर वन क्षेत्र।

प्रमुख विशेषताएँ

  • सिंहों की एकमात्र एशियाई प्रजाति
  • झुंड में रहने की प्रवृत्ति
  • विशिष्ट गर्दन की अयाल

जनसंख्या में गिरावट के कारण

  • ऐतिहासिक शिकार
  • सीमित आवास
  • रोगों का खतरा
  • मानवीय दबाव

संरक्षण प्रयास

गिर राष्ट्रीय उद्यान की सुरक्षा, प्रजनन कार्यक्रम तथा संरक्षण निगरानी।


3. लाल पांडा (Red Panda)

लाल पांडा हिमालय के घने वनों में रहने वाला अत्यंत आकर्षक और दुर्लभ स्तनधारी जीव है।

निवास स्थान

सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश तथा पूर्वी हिमालय।

प्रमुख विशेषताएँ

  • लाल-भूरे रंग का फर
  • घनी पूँछ
  • बाँस पर निर्भर भोजन

जनसंख्या में गिरावट के कारण

  • वनों का विनाश
  • अवैध व्यापार
  • जलवायु परिवर्तन
  • आवास विखंडन

संरक्षण प्रयास

संरक्षित वन क्षेत्र, सामुदायिक संरक्षण और वैज्ञानिक निगरानी कार्यक्रम।


4. गंगा डॉल्फिन (Ganges River Dolphin)

गंगा डॉल्फिन भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव है।

निवास स्थान

गंगा, ब्रह्मपुत्र तथा उनकी सहायक नदियाँ।

प्रमुख विशेषताएँ

  • मीठे पानी की डॉल्फिन
  • कम दृष्टि लेकिन अत्यधिक विकसित ध्वनि पहचान क्षमता
  • नदी पारिस्थितिकी का संकेतक जीव

जनसंख्या में गिरावट के कारण

  • नदी प्रदूषण
  • बाँध निर्माण
  • मछली पकड़ने के जाल
  • जल प्रवाह में कमी

संरक्षण प्रयास

राष्ट्रीय जलीय जीव का दर्जा, नदी संरक्षण योजनाएँ तथा डॉल्फिन संरक्षण कार्यक्रम।


5. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (Great Indian Bustard)

यह भारत के सबसे दुर्लभ पक्षियों में से एक है और वर्तमान में अत्यंत संकटग्रस्त स्थिति में है।

निवास स्थान

राजस्थान, गुजरात और कुछ घासभूमि क्षेत्र।

प्रमुख विशेषताएँ

  • विशाल आकार का पक्षी
  • खुले घासभूमि आवास का निवासी
  • लंबी टाँगें और मजबूत शरीर

जनसंख्या में गिरावट के कारण

  • घासभूमियों का विनाश
  • विद्युत तारों से टकराव
  • शिकार
  • आवास में मानवीय हस्तक्षेप

संरक्षण प्रयास

विशेष प्रजनन केंद्र, घासभूमि संरक्षण और सरकारी संरक्षण परियोजनाएँ।


6. घड़ियाल (Gharial)

घड़ियाल भारत की नदियों में पाया जाने वाला अत्यंत विशिष्ट सरीसृप है।

निवास स्थान

चंबल, गंगा तथा कुछ अन्य नदी तंत्र।

प्रमुख विशेषताएँ

  • लंबी और पतली थूथन
  • मुख्य रूप से मछली खाने वाला जीव
  • जल जीवन के लिए अत्यधिक अनुकूलित

जनसंख्या में गिरावट के कारण

  • नदी प्रदूषण
  • रेत खनन
  • बाँध निर्माण
  • अंडों का नष्ट होना

संरक्षण प्रयास

कैप्टिव ब्रीडिंग कार्यक्रम, राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य तथा नदी संरक्षण परियोजनाएँ।


संकटग्रस्त प्रजातियाँ क्यों महत्वपूर्ण हैं?

प्रत्येक जीव पारिस्थितिक तंत्र में एक विशेष भूमिका निभाता है। यदि कोई महत्वपूर्ण प्रजाति विलुप्त हो जाती है, तो पूरा पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।

बाघ शाकाहारी जीवों की संख्या नियंत्रित करता है, डॉल्फिन नदी की स्वास्थ्य स्थिति का संकेत देती है, घड़ियाल जलीय खाद्य श्रृंखला को संतुलित रखता है और गिद्ध प्राकृतिक सफाईकर्मी के रूप में कार्य करते हैं।

इसलिए किसी एक प्रजाति का संरक्षण केवल उस जीव की रक्षा नहीं है, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा है।


समापन: क्या हम इन्हें बचा पाएँगे?

जब हम बाघ, एशियाई शेर, लाल पांडा, गंगा डॉल्फिन, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और घड़ियाल जैसी प्रजातियों के बारे में पढ़ते हैं, तो यह केवल जीव विज्ञान का विषय नहीं रह जाता। यह हमारी प्राकृतिक विरासत की कहानी बन जाता है।

यदि संरक्षण प्रयास सफल रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ इन जीवों को जंगलों, नदियों और घासभूमियों में देख सकेंगी। लेकिन यदि हमने लापरवाही दिखाई, तो वे केवल चित्रों और पुस्तकों में ही शेष रह जाएँगे।

इसीलिए संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण केवल वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी का साझा दायित्व है।

भारत की स्थानिक प्रजातियाँ (Endemic Species of India)

क्या दुनिया में कुछ ऐसे जीव भी हैं जो केवल भारत में ही पाए जाते हैं?

यदि आपका उत्तर "नहीं" है, तो आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत में अनेक ऐसे जीव-जंतु और पौधे पाए जाते हैं जो पूरी पृथ्वी पर केवल यहीं मिलते हैं। यदि ये प्रजातियाँ भारत से समाप्त हो जाएँ, तो वे दुनिया से हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगी।

कल्पना कीजिए कि आप पश्चिमी घाट के घने जंगलों में घूम रहे हैं। पेड़ों की ऊँची शाखाओं पर एक काले रंग का बंदर दिखाई देता है जिसकी पूँछ के सिरे पर चाँदी जैसा गुच्छा है। यह लायन-टेल्ड मकाक है, जो दुनिया में केवल भारत में पाया जाता है।

इसी प्रकार कुछ जीव पर्वतीय घासभूमियों में, कुछ वर्षावनों में और कुछ भूमिगत जीवन जीते हुए केवल भारत के विशेष क्षेत्रों में विकसित हुए हैं। ऐसी प्रजातियों को ही स्थानिक प्रजातियाँ (Endemic Species) कहा जाता है।


स्थानिक (Endemic) का अर्थ क्या है?

जब कोई जीव या पौधा किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र तक ही सीमित हो और प्राकृतिक रूप से दुनिया के किसी अन्य भाग में न पाया जाए, तो उसे स्थानिक (Endemic) प्रजाति कहा जाता है।

सरल शब्दों में:
जो प्रजाति केवल किसी एक विशेष क्षेत्र में ही प्राकृतिक रूप से पाई जाती है और दुनिया के अन्य भागों में नहीं मिलती, उसे स्थानिक प्रजाति कहते हैं।

उदाहरण के लिए, यदि कोई जीव केवल पश्चिमी घाट में पाया जाता है और पृथ्वी के किसी अन्य क्षेत्र में नहीं मिलता, तो वह पश्चिमी घाट की स्थानिक प्रजाति कहलाएगा।


स्थानिकता (Endemism) कैसे विकसित होती है?

स्थानिकता लाखों वर्षों की विकास प्रक्रिया का परिणाम होती है। जब किसी क्षेत्र में जीव लंबे समय तक अलग-थलग रहते हैं, तो वे वहाँ की परिस्थितियों के अनुसार विशेष अनुकूलन विकसित कर लेते हैं।

धीरे-धीरे ये जीव अन्य क्षेत्रों की प्रजातियों से इतने अलग हो जाते हैं कि एक नई प्रजाति का निर्माण हो जाता है।

यदि वह प्रजाति उसी क्षेत्र तक सीमित रह जाती है, तो वह स्थानिक प्रजाति कहलाती है।


भौगोलिक अलगाव (Geographical Isolation) की भूमिका

स्थानिक प्रजातियों के विकास में भौगोलिक अलगाव की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

कभी-कभी पर्वत, नदियाँ, समुद्र, द्वीप या घने वन किसी जीव समूह को अन्य क्षेत्रों से अलग कर देते हैं।

जब लंबे समय तक इनका संपर्क बाहरी आबादी से नहीं होता, तब वे स्वतंत्र रूप से विकसित होने लगते हैं।

यही प्रक्रिया नई स्थानिक प्रजातियों के निर्माण का आधार बनती है।

याद रखें:
भौगोलिक अलगाव + लंबा विकासकाल = नई स्थानिक प्रजातियों का निर्माण

भारत की प्रमुख स्थानिक प्रजातियाँ

अब आइए भारत की उन विशेष प्रजातियों से मिलते हैं जो हमारी जैविक विरासत का अनमोल हिस्सा हैं।


1. नीलगिरि तहर (Nilgiri Tahr)

हमारी यात्रा दक्षिण भारत की नीलगिरि पहाड़ियों से शुरू होती है। यहाँ ऊँची पर्वतीय घासभूमियों में एक सुंदर पर्वतीय बकरी जैसी प्रजाति दिखाई देती है, जिसे नीलगिरि तहर कहा जाता है।

निवास स्थान

पश्चिमी घाट की ऊँची पर्वतीय घासभूमियाँ, विशेषकर तमिलनाडु और केरल।

विशेषताएँ

  • मजबूत शरीर और खुर
  • खड़ी चट्टानों पर आसानी से चलने की क्षमता
  • घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण भाग

स्थानिकता का कारण

पश्चिमी घाट की पर्वतीय श्रृंखलाओं ने इस प्रजाति को लंबे समय तक अलग रखा, जिससे यह केवल इसी क्षेत्र तक सीमित रह गई।


2. लायन-टेल्ड मकाक (Lion-tailed Macaque)

घने सदाबहार वनों की ऊपरी शाखाओं में रहने वाला यह दुर्लभ बंदर भारत की सबसे प्रसिद्ध स्थानिक प्रजातियों में से एक है।

निवास स्थान

केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के पश्चिमी घाट के वर्षावन।

विशेषताएँ

  • काला शरीर
  • चेहरे के चारों ओर चाँदी जैसे बाल
  • शेर की पूँछ जैसी गुच्छेदार पूँछ

स्थानिकता का कारण

पश्चिमी घाट के घने वर्षावनों में लंबे समय तक अलग-थलग रहने के कारण यह प्रजाति केवल भारत में विकसित हुई।


3. पर्पल फ्रॉग (Purple Frog)

अब हम एक ऐसे जीव से मिलते हैं जिसकी खोज वैज्ञानिकों ने हाल के वर्षों में की और जिसने पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया।

यह है पर्पल फ्रॉग, जो अपना अधिकांश जीवन जमीन के नीचे बिताता है।

निवास स्थान

पश्चिमी घाट क्षेत्र।

विशेषताएँ

  • बैंगनी रंग का शरीर
  • छोटी आँखें
  • भूमिगत जीवन शैली
  • विशेष प्रकार की आवाज़

स्थानिकता का कारण

यह प्रजाति लाखों वर्षों से पश्चिमी घाट की विशेष पर्यावरणीय परिस्थितियों में विकसित हुई है।


4. नीलगिरि लंगूर (Nilgiri Langur)

पश्चिमी घाट के वनों में रहने वाला यह सुंदर लंगूर भारत की एक अन्य महत्वपूर्ण स्थानिक प्रजाति है।

निवास स्थान

केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक के वन क्षेत्र।

विशेषताएँ

  • काला चमकदार शरीर
  • सुनहरे-भूरे रंग का सिर
  • वृक्षों पर रहने की आदत

स्थानिकता का कारण

पश्चिमी घाट के विशिष्ट वन वातावरण में लंबे विकासक्रम के कारण यह प्रजाति केवल इसी क्षेत्र तक सीमित रही।


5. मालाबार सिवेट (Malabar Civet)

भारत की सबसे दुर्लभ स्तनधारी प्रजातियों में से एक मालाबार सिवेट भी पश्चिमी घाट की स्थानिक प्रजाति मानी जाती है।

निवास स्थान

केरल और पश्चिमी घाट के कुछ वन क्षेत्र।

विशेषताएँ

  • रात्रिचर (Nocturnal) जीव
  • लंबा शरीर और पूँछ
  • घने वनों में रहने की प्रवृत्ति

स्थानिकता का कारण

विशिष्ट वन पारिस्थितिकी और भौगोलिक अलगाव ने इसे केवल इसी क्षेत्र तक सीमित रखा।



एक नज़र में प्रमुख स्थानिक प्रजातियाँ

प्रजाति मुख्य क्षेत्र विशेष पहचान
नीलगिरि तहर पश्चिमी घाट पर्वतीय घासभूमि का स्तनधारी
लायन-टेल्ड मकाक पश्चिमी घाट शेर जैसी पूँछ वाला बंदर
पर्पल फ्रॉग पश्चिमी घाट भूमिगत जीवन जीने वाला दुर्लभ मेंढक
नीलगिरि लंगूर पश्चिमी घाट काले रंग का वृक्षवासी प्राइमेट
मालाबार सिवेट पश्चिमी घाट दुर्लभ रात्रिचर स्तनधारी

पश्चिमी घाट स्थानिक प्रजातियों के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

यदि भारत को स्थानिक प्रजातियों का खजाना कहा जाए, तो पश्चिमी घाट उसका सबसे मूल्यवान हिस्सा है।

यह क्षेत्र लाखों वर्षों से अपेक्षाकृत स्थिर पर्यावरण प्रदान करता रहा है। यहाँ ऊँचे पर्वत, गहरी घाटियाँ, भारी वर्षा और घने वन पाए जाते हैं।

इन परिस्थितियों ने अनेक जीवों को अलग-थलग रखकर नई प्रजातियों के विकास का अवसर दिया।

इसी कारण पश्चिमी घाट को विश्व के प्रमुख Biodiversity Hotspots में शामिल किया गया है।


उत्तर-पूर्व भारत स्थानिक प्रजातियों का केंद्र क्यों है?

अब कल्पना कीजिए कि हम उत्तर-पूर्व भारत के घने वर्षावनों में प्रवेश कर रहे हैं।

यह क्षेत्र भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और हिमालयी जैव क्षेत्रों के संगम पर स्थित है।

यहाँ अत्यधिक वर्षा, पर्वतीय भू-आकृतियाँ और अलग-अलग प्रकार के वन पाए जाते हैं।

इन परिस्थितियों के कारण अनेक दुर्लभ और स्थानिक पौधे, पक्षी, उभयचर तथा स्तनधारी विकसित हुए हैं।

विशेष रूप से ऑर्किड, उभयचर और पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ केवल इसी क्षेत्र तक सीमित हैं।


भारत की स्थानिक प्रजातियाँ: हमारी अनमोल जैविक विरासत

स्थानिक प्रजातियाँ किसी भी देश की जैविक पहचान होती हैं। ये हमें बताती हैं कि किसी क्षेत्र में लाखों वर्षों के विकासक्रम ने कितनी अद्भुत जैव विविधता का निर्माण किया है।

नीलगिरि तहर की पर्वतीय छलांग, लायन-टेल्ड मकाक की वृक्षों पर गतिविधियाँ, पर्पल फ्रॉग का रहस्यमय भूमिगत जीवन और मालाबार सिवेट की दुर्लभ उपस्थिति हमें यह याद दिलाती है कि भारत केवल जैव विविधता से समृद्ध देश ही नहीं, बल्कि अद्वितीय स्थानिक प्रजातियों का भी घर है।

यदि इन प्रजातियों का संरक्षण नहीं किया गया, तो इनके साथ पृथ्वी का एक ऐसा हिस्सा भी खो जाएगा जिसे प्रकृति ने लाखों वर्षों में बनाया है और जो दुनिया में कहीं और मौजूद नहीं है।

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